Wednesday, August 26, 2020

शिक्षक दिवस पर भाषण || Short Speech on Teacher's Day in Hindi || 5th Sep...







आदरणीय शिक्षकों और मेरे सभी साथियों को सुप्रभात

आज हम सभी यहां शिक्षक दिवस मनाने के लिए और हमारे व राष्ट्र के भविष्य के निर्माण के लिए शिक्षकों के कठिन प्रयासों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। यह हर वर्ष 5 सितंबर को मनाया जाता है। इस दिन देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। डॉ. राधाकृष्णन एक विद्वान और बहुत बड़े शिक्षक थे। उन्होंने अपने जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में अपने दायित्वों को पूरा किया। शिक्षा के क्षेत्र में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है। उनके शिक्षा के प्रति लगन और शिक्षकों के प्रति आदर को देखते हुए उनके जन्म दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

 शिक्षक हमें अपने निरंतर प्रयासों के माध्यम से हमारे जीवन में शिक्षा के महत्व से अवगत कराते हैं। वे हमारी प्रेरणा के स्रोत होते हैं जो हमें आगे जाने और सफलता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करते हैं। वे हमें संसार भर के महान व्यक्तित्वों का उदाहरण देकर शिक्षा की ओर प्रोत्साहित करते हैं।

हमारे माता – पिता हमें जन्म देते हैं। शिक्षक हमें सही और गलत का फर्क बता कर हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। शिक्षक सही मार्ग दर्शन के साथ हमारे भविष्य को उज्जवल बनाते हैं। इसलिए कहा जाता है कि शिक्षकों का स्थान हमारे माता – पिता से भी ऊपर होता है। शिक्षा के बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। शिक्षक हमारे अंदर की बुराइयों को दूर कर हमें एक बेहतर इंसान बनाते हैं।

हमारे जीवन में शिक्षकों के इस योगदान के लिए हमें अपने शिक्षकों का हमेशा आदर और सम्मान करना चाहिए। टीचर्स डे पर मैं सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करती हूं। एक बार फिर से आप सभी को शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई।

धन्यवाद

Sunday, August 2, 2020

स्वतंत्रता दिवस भाषण || Best Speech on Independence Day (15 Aug 2020 ) i...






आदरणीय प्रिंसिपल सर, सभी शिक्षकगण, सहपाठियों और अभीभावकों को मेरा नमस्कार।


मैं आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन करती हूँ। आज हम सभी “स्वतंत्रता दिवस” मनाने के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं।



15 अगस्त 1947 भारत के लिए बहुत भाग्यशाली दिन था। इस दिन अंग्रजों की लगभग 200 वर्ष गुलामी के बाद हमारे देश को आज़ादी प्राप्त हुई थी। स्वतंत्रता सेनानियों के कठिन संघर्ष के बाद भारत अंग्रजों की हुकूमत से आज़ाद हुआ था। तब से ले कर आज तक 15 अगस्त को हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। भारत आज 74वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। ब्रिटिश शासन के दौरान देश पर कई तरह से अंग्रेजों ने अत्याचार किए, जिसके बाद कई महापुरुषों के बलिदान देने के बाद देश को आजादी मिली। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलाने में कई महापुरुषों ने अहम भूमिका निभाई। इनमें से कुछ नाम महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि हैं।

प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वतंत्रता का विशेष महत्व होता इस लिए हर भारतीय के लिए यह दिन बहुत महत्व रखता है। 15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रजों की परीतंत्रता के बाद स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। स्वतंत्रता दिवस को हम राष्ट्रीय त्योहार के रूप में मानते हैं। हम हर साल 15 अगस्त पर स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं इस दिन को आजादी के पहले दिन के रूप में मनाने के लिए और साथ ही उन महान सभी नेताओं के बलिदानों को भी याद करते हैं, जिन्होंने भारत को आजादी दिलाने में अपना बलिदान दिया। भारत के एक नागरिक के रुप में हमें अपने देश को विश्व का एक बेहतरीन देश बनाने के लिये और आगे बढ़ाने के लिये सभी मुमकिन प्रयास करना चाहिये।

धन्यवाद, जय हिन्द




Wednesday, July 22, 2020

कृष्ण जन्माष्टमी पर निबंध || Essay On "Krishna Janmashtami" || Simple Ja...







प्रस्तावना:- जन्माष्टमी हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है जन्माष्टमी पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, जो रक्षाबंधन के बाद भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।

जन्म अष्ठमी की तैयारी:- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मंदिरों को विशेष तौर से सजाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने का विधान है। इस दिन मन्दिरों में श्रीकृष्ण जी की सुंदर-सुंदर झाकिया बनाई जाती है। श्रीकृष्ण जी को झूले पर विठाया जाता है। उन्हें झूला दिया जाता है। कहि कहि रासलीला का आयोजन किया जाता है। रात ठीक 12 बजे श्रीकृष्ण जी की आरती की जाती है और प्रसाद बाटा जाता है।

जन्माष्ठमी दही हांडी उत्सव:- जन्माष्टमी के दिन देश में अनेक जगह दही-हांडी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। दही-हांडी प्रतियोगिता में सभी जगह के बाल-गोविंदा भाग लेते हैं। छाछ-दही आदि से भरी एक मटकी रस्सी की सहायता से आसमान में लटका दी जाती है और बाल-गोविंदाओं द्वारा मटकी फोड़ने का प्रयास किया जाता है। दही-हांडी प्रतियोगिता में विजेता टीम को उचित इनाम दिए जाते हैं। जो विजेता टीम मटकी फोड़ने में सफल हो जाती है वह इनाम का हकदार होती है।

जन्माष्टमी  क्यों मनाई जाती है : - जब कंश का पाप और धरती पर अत्याचार अत्यधिक बड़ गया तब उसका सर्वनाश करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने भगवान विष्णु जी के आठवे अवतार के रूप में धरती पर जन्म लिया था।

उपसंहार:- इस प्रकार श्रीकृष्ण जन्म जन्माष्टमी बहुत ही धूम धाम और हर्षोउल्लास से मनाने वाला त्योहार है। हमे भागवत गीता में दिए गए श्रीकृष्ण के उपदेशो का पालन करना चाहिए और इन्हें अपनाना चाहिए।

Thursday, July 16, 2020

राखी का त्यौहार || रक्षाबंधन पर निबंध || Raksha Bandhan Hindi Essay









प्रस्तावना

रक्षाबंधन भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। रक्षाबंधन को राखी भी कहते हैं। हर साल श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है।रक्षाबंधन भाई-बहन का त्यौहार है। रक्षाबंधन जुलाई या फिर अगस्त के महीने में आता है।
भाई-बहन के प्यार का प्रतीक

इस दिन बहने अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं और अपने भाई की लंबी आयु की कामना करती हैं। भाई अपनी बहन को उसकी रक्षा का वचन देता है। रक्षाबन्धन के दिन राखी बाँधने की बहुत पुरानी परम्परा है। रक्षाबंधन एक रक्षा का रिश्ता होता है जहाँ पर सभी बहन और भाई एक दूसरे के प्रति प्रेम और कर्तव्य का पालन, रक्षा का दायित्व लेते हैं और ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ रक्षाबंधन का उत्सव मनाते हैं।


रक्षा-बंधन का पौराणिक प्रसंग

राखी का त्योहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता। लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नज़र आने लगे। भगवान इन्द्र घबरा कर बृहस्पति के पास गये। वहां बैठी इन्द्र की पत्नी इंद्राणी सब सुन रही थी। उन्होंने रेशम का धागा मन्त्रों की शक्ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बाँध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। लोगों का विश्वास है कि इन्द्र इस लड़ाई में इसी धागे की मन्त्र शक्ति से ही विजयी हुए थे। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बाँधने की प्रथा चली आ रही है। यह धागा धन, शक्ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है।

इतिहास में श्री कृष्ण और द्रौपदी की कहानी प्रसिद्ध है, जिसमें जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उँगली पर पट्टी बाँध दी, और इस उपकार के बदले श्री कृष्ण ने द्रौपदी को किसी भी संकट में द्रौपदी की सहायता करने का वचन दिया था और उसी के चलते कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया। कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबन्धन के पर्व में यहीं से प्रारम्भ हुई।


महत्त्व

राखी का त्योहार संपूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है। हम यह पर्व सदियों से मनाते चले आ रहे हैं। आजकल इस त्योहार पर बहनें अपने भाई के घर राखी और मिठाइयाँ ले जाती हैं। भाई राखी बाँधने के पश्चात् अपनी बहन को दक्षिणा स्वरूप रुपए देते हैं या कुछ उपहार देते हैं। इस प्रकार आदान-प्रदान से भाई-बहन के मध्य प्यार और प्रगाढ़ होता है।

Wednesday, July 1, 2020

गुरु पूर्णिमा पर निबंध || Essay on Guru Purnima in Hindi || Guru Purnima...







आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरुओ, शिक्षको की पूजा और सम्मान किया जाता है। गुरु का हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।



यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है।वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे।

शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को 'गुरु' कहा जाता है।

गुरू पूर्णिमा का पर्व पूरे देश मनाया जाना स्वाभाविक है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का अत्ंयंत महत्व है। सच बात तो यह है कि आदमी कितने भी अध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ ले जब तक उसे गुरु का सानिध्य या नाम के अभाव में ज्ञान कभी नहीं मिलेगा वह कभी इस संसार का रहस्य समझ नहीं पायेगा। इसके लिये यह भी शर्त है कि गुरु को त्यागी और निष्कामी होना चाहिये। दूसरी बात यह कि गुरु भले ही कोई आश्रम वगैरह न चलाता हो पर अगर उसके पास ज्ञान है तो वही अपने शिष्य की सहायता कर सकता है। यह जरूरी नही है कि गुरु सन्यासी हो, अगर वह गृहस्थ भी हो तो उसमें अपने त्याग का भाव होना चाहिये। त्याग का अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक तथा नित्य कर्मों में लिप्त रहते हुए विषयों में आसक्ति रहित होने से है।

Wednesday, June 17, 2020

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर भाषण || Speech on International Yoga Day in H...







माननीय प्रधानाचार्य, आदरणीय प्रमुख अतिथि, शिक्षकगण और मेरे प्यारे विद्यार्थियों - सभी को नमस्कार!

अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाता है। यह दिन वर्ष का सबसे लम्बा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है। पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की थी

आप सभी जानते हैं कि योग का महत्व जीवन में कितना ज्यादा है। योग की मदद से हम कई सारे विकारों को दूर कर सकते हैं। योग हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है। अगर नियमित तौर पर, रोज सुबह उठकर योग का अभ्यास किया जाया करे, तो योग हर तरह के उपचार एवं चिकित्सा से ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। नियमित योग करने से शरीर सभी बिमारियों से दूर रहता है। योगा भारत में उत्पन्न हुआ था और इसलिए इसे "योगा" के रूप में दुनिया भर में जाना जाता है। यह हमारे शरीर से नकारात्मकता और मानसिक रोगों को दूर करने में मदद करता है। यह तनाव स्तर को कम करने और जागरूकता बढ़ाने में मदद करता है। विशेष रूप से बच्चों के लिए यह एकाग्रता शक्ति और फोकस के निर्माण में मदद करता है।



इस साल 21 जून 2020 को योग दिवस की थीम 'घर पर योग और परिवार के साथ योग है। इस थीम के मुताबिक, लोग 21 जून को सोशल मीडिया के माध्यम से सुबह सात बजे अपने परिवार के साथ योग दिवस में शामिल हो सकेंगे।

धन्यवाद।

Monday, June 15, 2020

पितृ दिवस पर निबंध || Father’s day (21 जून) Essay || Speech on Father's ...









पिता दिवस बच्चों के जीवन के विकास में पिता के योगदान को पहचानने के लिए दुनिया भर में मनाया जाता है। इस दिन हर कोई अपने पिता को विशेष महसूस कराने की कोशिश करता है। इस साल Father's day 21 जून 2020 को मनाया जाएगा। पिता हर परिवार में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति होता है। वह अपने परिवार की ख़ुशी के लिए दिन-रात मेहनत करता है। एक पिता वह होता है जो अपने बच्चों और परिवार का ख्याल रखता है। पिता के महान बलिदान के लिए धन्यवाद देने और सम्मानित करने के लिए ही Fathers Day मनाया जाता है।

फादर्स डे की शुरूआत अमेरिका के वाशिंगटन से हुई थी।

सबसे पहले फादर्स डे को 19 जून 1910 मनाया गया था।

सोनोरा डॉड (Sonora Dodd) ने अपने पिता की याद में वॉशिंगटन के स्पोकेन शहर में इस दिन की शुरुआत की थी। सोनोरा डॉड के पिता एक किसान थे और सेना में अपनी भूमिका निभा चुके थे। सोनोरा डॉड की माँ की मृत्‍यु उनके बचपन में हो गई थी। इसके बाद उनके पिता ने उन्‍हें माता और पिता दोंनों का प्‍यार दिया था। फादर्स डे (Father’s Day) को मनाने की बात सोनोरा डॉड के दिमाग में मदर्स डे के दिन से आई थी।

अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन (Woodrow Wilson) सन 1916 में ने फादर्स डे को मनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी।

अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने 1966 में इसे जून के तीसरे रविवार को मनाने का फैसला किया।



जिस प्रकार माँ हमारी प्रथम शिक्षिका होती है तो पिता भी एक गुरु के समान होता है जो अपने संतान रूपी शिष्य को भले ही बाहर से डांट पड़ती है लेकिन अंदर से अपने शिष्य को सम्हालते हुए जीवन में आगे बढ़ने का पाठ पढ़ाते है।

अर्थात गुरु यानी पिता उस कुम्हार के समान होता है जो अपने घड़े को सुंदर बनाने के लिए घड़े के अंदर हाथ डालते हुए बाहर से थाप देता है और उसे एक सुंदर घड़े का रूप देता है,

ठीक उसी प्रकार एक पिता भी एक गुरु के रूप में अपने शिष्य रूपी सन्तान को कठोर अनुशासन रखते हुए लेकिन मन से प्रेम भावना रखते हुए अपने बेटो को बुराई के रास्ते से बचाते हुए इस संसार में अपने संतान को सम्मानित बनाता है और और उसे सफलता के मार्ग अपर ले जाता है।

इस प्रकार जब बच्चे छोटे होते है तो पिता के रूप में अच्छे बुरे का फर्क सिखाते है और यही बच्चे जब बड़े हो जाते है तो पिता अपने बच्चो के दोस्त बनाकर एक सलाहकार के रूप में आगे बढने का मार्ग प्रसस्त करते है.

Saturday, June 6, 2020

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस निबंध || International Yoga Day Essay in Hindi |...








योग दिवस निबंध
Yoga Day Essay in Hindi



प्रस्तावना

योग शब्द की उत्पत्त‍ि संस्कृति के युज से हुई है, जिसका मतलब होता है आत्मा का सार्वभौमिक चेतना से मिलन। योग, मन, शरीर और आत्मा की एकता को सक्षम बनाता है। योग के विभिन्न रूपों से हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अलग-अलग तरीकों से लाभ मिलता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को इस अनूठी कला का आनंद लेने के लिए मनाया जाता है।

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

वर्ष 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव दिया। संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) को यह प्रस्ताव पसंद आया और 21 जून 2015 को पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। श्री मोदी द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव और यू.एन. द्वारा किए गए निर्णय की दुनिया भर के आध्यात्मिक नेताओं और योग के चिकित्सकों द्वारा इसकी सराहना की गई।

पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया। इस दिन पर भारत में एक बड़ा आयोजन आयोजित किया गया था।

भगवद्‍गीता में योग के जो तीन प्रमुख प्रकार बताए गए हैं वे निम्न हैं-



1 कर्मयोग - इसमें व्यक्ति अपने स्थिति के उचित और कर्तव्यों के अनुसार कर्मों का श्रद्धापूर्वक निर्वाह करता है।



2 भक्ति योग - इसमें भगवत कीर्तन प्रमुख है। इसे भावनात्मक आचरण वाले लोगों को सुझाया जाता है।



3 ज्ञान योग -
इसमें ज्ञान प्राप्त करना अर्थात ज्ञानार्जन करना शामिल है।



इसी तरह अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर देश के कई हिस्सों में कई बड़े और छोटे समारोह आयोजित किए गए। भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक दल के सभी सैनिकों ने भी विभिन्न हिस्सों में मनाए जाने वाले योग दिवस के समारोहों में भाग लिया। हमारे पड़ोसी देशों और दुनिया भर के अन्य देशों ने भी समान उत्साह के साथ इस दिन को मनाया।

निष्कर्ष

21 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्राचीन भारतीय कला के लिए एक अनुष्ठान है। हमारे दैनिक जीवन में योग को जन्म देने से हमारे जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आ सकता है। यह हमारे तनावपूर्ण जीवन के लिए एक बड़ी राहत प्रदान करता है।

Tuesday, May 26, 2020

World Environment Day Essay in Hindi || पर्यावरण दिवस पर निबन्ध || 5 जून...




पर्यावरण दिवस पर निबंध  || 5 जून || पर्यावरण दिवस || Environment Day Essay


World Environment Day in Hindi




5 जून को पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्त्व में प्रत्येक वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस ( World Environment Day) मनाया जाता है । इसकी शुरुआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य लोगो को पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जागरूक करना था जो की विश्व पर्यावरण दिवस मनाये जाने का मुख्य लक्ष्य था।

पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ है परि + आवरण यानी चारो तरफ से घिरा हुआ एक ऐसा आवरण जो जीवन जीने के उपयुक्त बनाती है अर्थात हमारे चारो तरफ पाए जाने वाले पेड़- पौधे, वायु, पहाड़, मिट्टी, नदिया, जंगल, जीव-जन्तु आदि सभी मिलकर पर्यावरण का निर्माण करते है।

यानि बिना पर्यावरण के मानव या किसी भी जीव-जन्तु, पेड़ पौधे, वनस्पति आदि किसी का भी अस्त्तिव नही है सभी एक दुसरे के पूरक है यदि इनमे किसी में भी बदलाव होता है तो इसका असर सभी के ऊपर देखने को मिलता है. विश्व पर्यावरण दिवस के माध्यम से लोगो को पर्यावरण के प्रति सुरक्षा को लेकर जागरूक करने के लिए विभिन्न प्रकार के क्रियाकलाप आयोजित किये जाते है जिनमे नाटक, नुक्कड़ मंच, सफाई और प्रदुषण के प्रति लोगो को जागरूक करना, भाषण, संवाद जैसे अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है जिसमे लोग भाग लेकर पर्यावरण की कैसे सुरक्षा कैसे किया जा सकता है इसके प्रति जागरूक होते है।

मानव और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। पर्यावरण जैसे जलवायु प्रदूषण या वृक्षों का कम होना मानव शरीर और स्वास्थय पर सीधा असर डालता है। मानव की अच्छी-बूरी आदतें जैसे वृक्षों को सहेजना, जलवायु प्रदूषण रोकना, स्वच्छाता रखना भी पर्यावरण को प्रभावित करती है। मानव की बूरी आदतें जैसे पानी दूषित करना, बर्बाद करना, वृक्षों की अत्यधिक मात्रा में कटाई करना आदि पर्यावरण को बूरी तरह से प्रभावित करती है। जिसका नतीजा बाद में मानव को प्राकर्तिक आपदाओं का सामना करके भुगतना ही पड़ता है।संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित यह दिवस पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर जागरूकता लाने के लिए मनाया जाता है।

विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगो को पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर जागरूक करना है इस विश्व पर्यावरण दिवस के माध्यम से लोगो में यह प्रेरित किया जाता है की कैसे हम अपनी संसाधनों को पूरा करते हुए भी पर्यावरण की सुरक्षा को बनाये रखे.

Tuesday, May 5, 2020

बुद्ध पूर्णिमा पर निबंध || Essay on Buddha Purnima in Hindi || बुद्ध जयं...






बुद्ध पूर्णिमा पर निबंध Essay on Buddha Purnima in Hindi



'बुद्ध पूर्णिमा', बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे बड़ा त्यौहार होता है। इसको 'बुद्ध जयंती' के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार वैशाख माह की पूर्णिमा को बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है। इसीलिये इसे 'वैशाख पूर्णिमा' भी कहा जाता है। यह गौतम बुद्ध की जयंती है। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे।

बौद्ध धर्म के अनुयायी बुद्ध पूर्णिमा को सम्पूर्ण विश्व मेँ बहुत धूमधाम से मनाते हैं। बुद्ध जयंती का मुख्य उत्सव बोध गया में होता है। बौद्ध धर्म के लोगों के लिए, बोध गया गौतम बुद्ध के जीवन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। बोध गया श्राइन, बुद्ध की प्रबुद्धता की जगह को चिह्नित करती है। बोध गया भारत में बिहार के गया जिले में एक छोटा सा शहर है। बौद्ध पूर्णिमा के दिन भक्त मंदिरों में दान करते हैं।
भगवान बुद्ध की शिक्षाएं व नियम

बुद्ध की शिक्षाएं पूरी तरह से मनुष्यों को दुख और जीवन के पीड़ा से मुक्त करने के लिए हैं। बौद्ध धर्म की प्राथमिक शिक्षाएं चार मुक्य सत्य, आठवें पथ और अवधारणाएं हैं। यह चार परम सत्य बौद्ध धर्म की नींव हैं। इन चार सत्यों पर केंद्रित उनके ज्ञान के बाद बुद्ध का पहला उपदेश – 

चार परम सत्य 

सभी मानव परिस्थितियों में पीड़ा होती है।
पीड़ा का कारण होता है।
वह कारण लालसा या इच्छा है।
पीड़ा के समापन के लिए एक ही रास्ता है।
आठ पथ Eight paths

चौथा नोबल सत्य आठवां पथ है, या अभ्यास के आठ क्षेत्रों जो जीवन के सभी पहलुओं को छूते हैं।
सही विश्वास (सत्य में)
सही इरादा (बुराई के बजाय अच्छा करने में)
सही भाषण (असत्य, निंदा और शपथ ग्रहण से बचें)
सही व्यवहार (दोष पूर्ण व्यवहार से बचें)
सही आजीविका (कुछ व्यवसाय जैसे कसाई, प्रचारक, अपमानित थे)
सही प्रयास (अच्छे की तरफ)
सही अनुष्ठान (सत्य का)
सही एकाग्रता (इन नियमों का पालन करने के परिणामस्वरूप)
अवधारणाएं Concepts

बौद्ध धर्म का मानना ​​है कि एक व्यक्ति कुल सही दिशा में आगे बढ़ना तब शुरू कर सकता है जब वह बुद्ध और उनकी शिक्षाओं और उनके मठों में विश्वास रखे। साथ ही पांच मौलिक नैतिक नियमों को अपना कर भी-
हत्या नहीं करना
चोरी नहीं करना
लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से विरत रहना
झूठ कभी नहीं बोलना
नशे की लत से दूर

Sunday, May 3, 2020

मदर्स डे पर निबंध || मातृ दिवस पर निबंध || Mother's Day Essay in Hindi...






मदर्स डे पर निबंध – मातृ दिवस पर निबंध – Mother Day Essay in Hindi


मातृ दिवस का मतलब होता है मां का दिन। पूरी दुनिया में मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है। मातृ दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य मां के प्रति सम्मान और प्रेम को प्रदर्शित करना है। हर जगह मातृ दिवस मनाने का तरीका अलग-अलग होता है, लेकिन इसका उद्देश्य एक ही होता है।

मातृ दिवस 

मातृ दिवस मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की मां को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। हर मां अपने बच्चों के प्रति जीवन भर समर्पित होती है। मां के त्याग की गहराई को मापना भी संभव नहीं है और ना ही उनके एहसानों को चुका पाना। लेकिन उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।

मां के प्रति इन्हीं भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से मातृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से मां के लिए समर्पित है। इस दिन को दुनिया भर में लोग अपने तरीके से मनाते हैं। कहीं पर मां के लिए पार्टी का आयोजन होता है तो कहीं उन्हें उपहार और शुभकामनाएं दी जाती है। कहीं पर पूजा अर्चना तो कुछ लोग मां के प्रति अपनी भावनाएं लिखकर जताते हैं।

मदर्स डे एक ऐसा दिन होता है जो हर बच्चा अपनी माँ के लिये खासतौर से मनाता है। ये एक महत्वपूर्णं उत्सव के तौर पर हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। स्कूलों में बच्चों के साथ मातृ-दिवस मनाने का प्रचलन है। अपने बच्चों के द्वारा माँ ग्रीटिंग्स कार्ड, विशिंग कार्ड तथा दूसरे खास उपहार प्राप्त करती है। इस दिन पारिवारिक सदस्य बाहर जाकर लज़ीज़ पकवानों का लुफ्त उठाते है तथा और खुशी मनाते है। माँ भी अपने प्यारे बच्चों को ढ़ेर सारा प्यार और उपहार तथा देख-भाल करती है।

स्कूल आने के लिये बच्चों के द्वारा खासतौर से अपनी माँ को आमंत्रित किया जाता है जहाँ पर शिक्षक, बच्चे और माँ मातृ-दिवस को खूब अच्छे से मनाते है। माँ अपने बच्चों के लिये उनकी पसंद के मुताबिक मैक्रोनी, चाउमीन, मिठाई, बिस्किट आदि जैसे कुछ खास पकवान बनाती है। इस दिन को पूरी मस्ती के साथ मनाने के लिये माँ और बच्चे दोनों नृत्य, गायन, भाषण आदि जैसे क्रिया-कलापों में भी भाग लेते है। मातृ-दिवस से संबंधित कार्यक्रमों जैसे गायन, नृत्य, भाषण, तुकबंदी व्याख्यान, निबंध लेखन तथा मौखिक बातचीत आदि में बच्चे भाग लेते है। उत्सव के समापन पर माताओं के द्वारा बनाया गया खास पकवान शिक्षकों और विद्यार्थियों को परोसा जाता है। सभी एकसाथ इसको खाते है और इसका आनन्द उठाते है।


हमारी माँ बहुत खास होती है। थकी हुई होने के बावजूद वह हमारे लिये हमेशा मुस्कुराती रहती है। रात में सोते समय वह हमें बहुत सारी कविताएँ और कहानियाँ सुनाती है। माँ हमारे गृह-कार्य, प्रोजेक्ट और परीक्षा के समय बहुत मदद करती है। वह हमारे स्कूल ड्रेस का ध्यान रखती है। वह हमें सिखाती है कि खाना खाने से पहले हाथ को अच्छी तरह से साबुन से धो लेना चाहिये। वह हमें अच्छा शऊर, शिष्टाचार, नैतिकता, इंसानियत और हमेशा दूसरो की मदद करना सिखाती है। वह हमारे पिता, दादा-दादी और छोटी बहन का ध्यान रखती है। हम सभी उनको बहुत प्यार करते है और हर सप्ताह उन्हें बाहर घुमाने ले जाते है।

Sunday, April 26, 2020

मज़दूर दिवस पर निबंध || Simple & Short Essay on Labour Day in Hindi || L...







मज़दूर दिवस पर निबंध- Essay on Labour Day in Hindi
प्रस्तावना

विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस “1 मई” के दिन मनाया जाता है। किसी भी देश की तरक्की उस देश के किसानों तथा कामगारों (मजदूर / कारीगर) पर निर्भर होती है। किसी समाज, देश, उद्योग, संस्था, व्यवसाय को खड़ा करने के लिये कामगारों (कर्मचारीयों) की विशेष भूमिका होती है।

मजदुरों के बिना किसी भी देश का विकास नहीं किया जा सकता है और न हीं कोई उद्योग कार्य कर सकता है। मजदुर दिवस को श्रमिक दिवस और मई डे के नाम से भी जाना जाता है। यह ज्यादातर 1 मई को मनाया जाता है।

अधिकांश देशों में यह सार्वजनिक अवकाश का दिन है। यह 1 मई को 80 से अधिक देशों में मनाया जाता है। कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका सितंबर के पहले सोमवार को इसे मनाते हैं। इस तिथि को मनाने के लिए कई देशों की अपनी अलग-अलग तिथि है। हालांकि उत्सव को मनाने का कारण एक समान रहता है और वह श्रम वर्ग की कड़ी मेहनत का जश्न मनाने के लिए है।

मजदूर दिवस की उत्पत्ति

इसकी शुरूआत अमेरिका के शिकागो की हेय मार्केट से हुई 1 मई, 1886 से हुई थी। वहाँ के मजदुरों ने कार्य करने के सीमा 10-12 घंटे तक हटाकर 8 घंटे करने के लिए हड़ताल की थी। उस दिन पुलिस द्वारा चलाई गई गोलियों से सात लोगों की मौत हुई। लेकिन अंत में मजदुरों की माँग मान ली गई थी।

भारत में मजदूर दिवस –

1923 में भारत में मजदुर दिवस पहली बार चैन्नई में मनाया गया था। यह उत्सव भारतीय श्रमिक किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान द्वारा मद्रास में आयोजित किया गया था। इस दिन कॉमरेड सिंगारवेलियर ने राज्य में विभिन्न स्थानों पर दो बैठकें आयोजित कीं। इनमें से एक का आयोजन ट्रालीकलान बीच पर किया गया था और दूसरी को मद्रास हाई कोर्ट के समीप समुद्र तट पर व्यवस्थित किया गया था। उन्होंने एक संकल्प पारित कर कहा कि सरकार को इस दिन राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा करनी चाहिए।

महाराष्ट्र राज्य में 1 मई को महाराष्ट्र दिवस के रूप में मनाया जाता है और गुजरात में इसे गुजरात दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसका कारण यह है कि 1960 में इसी दिन महाराष्ट्र और गुजरात को राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ था।

भारत में मजदूर दिवस – उत्सव


बहुत संघर्ष के बाद श्रमिकों को उनके अधिकार दिए गए थे। जिन्होंने इस दिवस के लिए कड़ी मेहनत की उन्होंने इसके महत्व को और अधिक बढ़ा दिया। इस दिन का उनके लिए विशेष महत्व था। इस प्रकार अधिकांश देशों में श्रम दिवस समारोह ने शुरू में अपने संघ के उन नेताओं को सम्मान देने का काम किया जिन्होंने इस विशेष दिन का दर्जा हासिल किया और दूसरों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया। प्रमुख नेताओं और श्रमिकों द्वारा एक साथ प्रसन्नता के साथ समय बिताने पर भाषण दिए जाते हैं।

ट्रेड यूनियन मजदूरों की टीम के लिए विशेष लंच और रात्रिभोज या संगठित पिकनिक और आउटिंग आयोजित करते हैं। कार्यकर्ताओं के अधिकारों का जश्न मनाने के लिए अभियान और परेड आयोजित की जाती हैं। पटाखे भी जलाए जाते हैं।

जहाँ कई संगठन और समूहों द्वारा इस दिन पर लंच और पिकनिक और ट्रेड यूनियनों द्वारा अभियान तथा परेड आयोजित किए जाते हैं वहीँ कई लोग इस दिन को बस आराम करने और फिर से जीवंत करने के अवसर के रूप में देखते हैं। वे अपने लंबित घरेलू कार्यों को पूरा करने में समय व्यतीत करते हैं या अपने दोस्तों और परिवार के साथ बाहर जाते हैं।

Tuesday, April 21, 2020

आदि शंकराचार्य पर निबंध || Simple & Short Essay on Adi Shankaracharya in...









आदि शंकराचार्य जी भारत मे एक महान दार्शनिक और धर्मप्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं। आदि शंकरचार्य का जन्म 788 ई. में केरल में कालपी अथवा 'काषल' नामक ग्राम में हुआ था। आदि शंकराचार्य जी के पिता जी का नाम शिवगुरु तथा माता जी का नाम सुभद्रा था।



इनके पिता जी ने इनकी माता जी के साथ सन्तान प्राप्ति के लिए भगवान शिव की बहुत दिनों तक आराधना की थी जिसके बाद आदि शंकराचार्य जी का जन्म हुआ था इसीलिए इनके पिता जी ने इनका नाम शंकर रखा था। जब ये तीन ही वर्ष के थे तब इनके पिता का देहांत हो गया। जब ये पांच(5) वर्ष के थे तभी इनकी माता जी ने इनका यज्ञोपवीत संस्कार करा कर इनको गुरुकुल में वेदों के अध्ययन के लिए भेज दिया था।

ये बड़े ही मेधावी तथा प्रतिभाशाली थे। छह वर्ष की अवस्था में ही ये प्रकांड पंडित हो गए थे और आठ वर्ष की अवस्था में इन्होंने संन्यास ग्रहण किया था। इनके सन्यास धारण करने के सन्दर्भ में एक कथा प्रचलित है जिसमें बताया गया है कि जब इन्होंने अपनी माता जी से सन्यास धारण करने की अनुमति मांगी तो एक मात्र पुत्र होने के कारण इनकी माता ने आदि शंकराचार्य जी को सन्यास धारण करने से मना कर दिया।



परन्तु एक दिन जब ये नदी में नहा रहे थे तो एक मगरमच्छ ने इनके पैर को पकड़ लिया और इसी अवसर का लाभ उठा कर इन्होंने अपनी माता जी से कहा कि मुझे सन्यास धारण करने की अनुमति नही देंगी तो यह मगरमच्छ मुझे मार डालेगा।

आदि शंकराचार्य जी के प्राणों को संकट में देखकर इनकी माता जी ने इन्हें सन्यास धारण करने की अनुमति दे दी। जैसे ही इनकी माता जी ने इन्हें सन्यास धारण करने की अनुमति दी वैसे ही उस मगरमच्छ ने आदि शंकराचार्य जी के पैरों को भी छोड़ दिया।



आदि शंकर ये भारत के एक महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक थे। उन्होने अद्वैत वेदान्त को ठोस आधार प्रदान किया। उन्होने सनातन धर्म की विविध विचारधाराओं का एकीकरण किया। उपनिषदों और वेदांतसूत्रों पर लिखी हुई इनकी टीकाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिन पर आसीन संन्यासी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं- (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ। इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दीक्षित किया था। ये शंकर के अवतार माने जाते हैं। इन्होंने ब्रह्मसूत्रों की बड़ी ही विशद और रोचक व्याख्या की है।

हिंदू कैलेंडर के अनुसार आदि गुरु शंकराचार्य जी की जयंती, प्रत्येक वर्ष के वैशाख माह की शुक्ल पंचमी के दिन देश के सभी मठों में विशेष हवन पूजन तथा शोभा यात्रा निकाल कर मनाई जाती है।

32 वर्ष की अल्प आयु में सन् 820 ई. में केदारनाथ के समीप आदि गुरु शंकराचार्य स्वर्गवासी हुए थे।

Friday, April 17, 2020

अक्षय तृतीया पर्व पर निबंध || Akshaya Tritiya Essay in Hindi || Akshaya ...






अक्षय तृतीया 

हिन्दू धर्म के अनुसार अक्षय तृतीया त्यौहार का विशेष महत्व है , अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तो में मानी गई है।

इस दिन नए कार्य शुरू करने के लिए शुभ माना जाता है. और कुछ लोग इस दिन अक्षय तृतीया पर सोने खरीदने के लिए भी शुभ माना जाता है। जिस कारण से अक्षय तृतीया के दिन सोने की खरीदारी बढ़ जाती है, जो की समृद्धि का प्रतिक माना जाता है। अक्षय तृतीया की तिथि बहुत शुभ मानी जाती है, इस तिथि को बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे- विवाह, गृह प्रवेश, वस्त्र-आभूषण खरीदना, वाहन एवं घर आदि खरीदा जा सकता है। अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि विधान से पूजा किया जाता है, इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी को चावल चढ़ाना, तुलसी के पत्तो में भोजन के भोग लगाना और विधिवत पूजा पाठ करने का विधान है, फिर इस दिन दान देने की भी परंपरा है जिससे सुख समृधि की कामना किया जाता है। इस दिन गंगा स्नान करने से तथा भगवत पूजन से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस दिन किया गया जप, तप, हवन, स्वाध्याय और दान भी अक्षय हो जाता है।

महत्व  

पौराणिक कथाओं और प्राचीन इतिहास के अनुसार, अक्षय तृतीया दिन कई महत्वपूर्ण घटनाओं को दर्शाता है-
भगवान गणेश और वेद व्यास ने महाकाव्य महाभारत को इस दिन लिखा था। 

इस दिन को भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है |
कहते है- इस दिन, देवी अन्नपूर्णा का जन्म हुआ। 

इस दिन, भगवान कृष्ण ने अपने गरीब दोस्त सुदामा को धन और मौद्रिक लाभ प्रदान किया था । 

महाभारत के अनुसार, इस दिन भगवान कृष्ण ने अपने निर्वासन के दौरान पांडवों को ‘अक्षय पात्र दिया था । उन्होंने इस कटोरे के साथ आशीष दिया था कि यह पात्र हमेशा असीमित मात्रा में भोजन से भरा रहेगा तथा कोई भी कभी भूखा नहीं रहेगा। 

अक्षय तृतीया के दिन, गंगा नदी पृथ्वी पर स्वर्ग से उतरी थी ।
 
इस दिन कुबेरा ने देवी लक्ष्मी जी की उपासना की थी, और इस तरह उन्हें भगवान के खजांची होने का काम सौंपा गया। 

जैन धर्म में, इस दिन भगवान आदिनाथ, जैनों के पहले भगवान की स्मृति में मनाया जाता है। 

धार्मिक क्रिया  
भगवान विष्णु के भक्त, अक्षय तृतीया के दिन देवता की पूजा करते है और उपवास रखते हैं। बाद में, चावल, नमक, घी, सब्जियां, फलों और कपड़े गरीबों को वितरित करके दान किया करते है। तुलसी का पानी भगवान विष्णु के प्रतीक के रूप में चारों ओर छिड़का जाता है। 


अक्षय तृतीया के दिन, कई लोग सोना और सोने से बने आभूषण भी खरीदते हैं। जैसा कि कहा जाता है कि सोना अच्छे भाग्य और धन का प्रतीक होता है , सोना खरीदना इस दिन पवित्र माना जाता है।

लोग इस दिन नया व्यापार उद्यम, निर्माण कार्य आदि शुरू करते है। 

अन्य अनुष्ठानों की तरह इस दिन लोग गंगा में एक पवित्र स्नान भी करते है , जौ को एक पवित्र आग में भेंट करते है, तथा प्रसाद बनाया जाता है और दान किया जाता है। 


भविष्य में अच्छा भाग्य सुनिश्चित करने के लिए आध्यात्मिक गतिविधियों जैसे ध्यान और पवित्र मंत्र का जप करना महत्वपूर्ण माना जाता है। 

Thursday, April 16, 2020

पृथ्वी दिवस पर निबंध || Earth Day Essay in Hindi || विश्व पृथ्वी दिवस ||...





Earth Day Essay in Hindi

'विश्व पृथ्वी दिवस' प्रत्येक वर्ष 22 अप्रैल को सम्पूर्ण विश्व में मनाया जाता है। विश्व पृथ्वी दिवस की स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गयी और अब इसे 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

पृथ्वी हमारी धरोहर है, इसकी रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। प्रकृति ने हमें सूर्य, चाँद, हवा, जल, धरती, नदियां, पहाड़, हरे-भरे वन और धरती के नीचे छिपी हुई खनिज सम्पदा धरोहर के रूप में हमारी सहायता के लिए प्रदान किये हैं। प्रकृति द्वारा दी गई ये सभी वस्तुएं सीमित हैं। विश्व पृथ्वी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण सुरक्षा के बारे में लोगों के बीच जागरुकता बढ़ाना है।

यह एक वार्षिक आयोजन है, जिसे विश्व भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया जाताा है। इस दिन विश्व स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कई समुदाय और एनजीओ, पृथ्वी सप्ताह का समर्थन करते हुए पूरे सप्ताह विश्व के पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर पृथ्वी को बचाने के लिए अनुकरणीय कदम उठा रहे हैं।

विश्व पृथ्वी दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण सुरक्षा के बारे में लोगों के बीच जागरुकता बढ़ाना है। यह दिन इस बात के चिंतन-मनन का दिन है कि हम कैसे अपनी वसुंधरा को बचा सकते हैं।

Friday, April 10, 2020

कोरोना वायरस पर हिन्दी में निबंध || Covid-19 Essay || Hindi Essay on Cor...







कोरोनावायरस (Coronavirus) कई प्रकार के विषाणुओं (वायरस) का एक समूह है जो स्तनधारियों और पक्षियों में रोग उत्पन्न करता है। यह आरएनए वायरस होते हैं। इनके कारण मानवों में श्वास तंत्र संक्रमण पैदा हो सकता है विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित कर दिया है। 
कोरोना वायरस बहुत सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वायरस है। कोरोना का संक्रमण दुनियाभर में तेजी से फ़ैल रहा है। इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है। इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था। 

लातीनी भाषा में "कोरोना" का अर्थ "मुकुट" होता है और इस वायरस के कणों के इर्द-गिर्द उभरे हुए कांटे जैसे ढाँचों से इलेक्ट्रान सूक्षमदर्शी में मुकुट जैसा आकार दिखता है, जिस पर इसका नाम रखा गया था।





कोरोना वायरस क्या है?

कोरोना वायरस (सीओवी) का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है। इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है। यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है।

लक्षण

Covid-19 / कोरोना वायरस में पहले बुख़ार होता है। इसके बाद सूखी खांसी होती है और फिर एक हफ़्ते बाद सांस लेने में परेशानी होने लगती है। कोरोना वायरस के गंभीर मामलों में निमोनिया, सांस लेने में बहुत ज़्यादा परेशानी, किडनी फ़ेल होना और यहां तक कि मौत भी हो सकती है। बुजुर्ग या जिन लोगों को पहले से अस्थमा, मधुमेह या हार्ट की बीमारी है उनके मामले में ख़तरा गंभीर हो सकता है। ज़ुकाम और फ्लू में के वायरसों में भी इसी तरह के लक्षण पाए जाते हैं।



बचाव के उपाय?

स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने कोरोना वायरस से बचने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
इनके मुताबिक हाथों को साबुन से धोना चाहिए।
अल्‍कोहल आधारित हैंड रब का इस्‍तेमाल भी किया जा सकता है।
खांसते और छीकते समय नाक और मुंह रूमाल या टिश्‍यू पेपर से ढंककर रखें।
जिन व्‍यक्तियों में कोल्‍ड और फ्लू के लक्षण हों, उनसे दूरी बनाकर रखें।

कोरोना का संक्रमण फैलने से कैसे रोकें?

खांसते या छींकते वक़्त अपना मुंह ढंक लें।
सार्वजनिक वाहन जैसे बस, ट्रेन, ऑटो या टैक्सी से यात्रा न करें।
घर में मेहमान न बुलाएं।
घर का सामान किसी और से मंगाएं।
ऑफ़िस, स्कूल या सार्वजनिक जगहों पर न जाएं।
अगर आप और भी लोगों के साथ रह रहे हैं, तो ज़्यादा सतर्कता बरतें।
अलग कमरे में रहें और साझा रसोई व बाथरूम को लगातार साफ़ करें।
14 दिनों तक ऐसा करते रहें ताकि संक्रमण का ख़तरा कम हो सके।
अगर आप संक्रमित इलाक़े से आए हैं या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहे हैं तो आपको अकेले रहने की सलाह दी जा सकती है। अत: घर पर रहें।



मास्क कौन और कैसे पहनें?



अगर आप स्वस्थ हैं तो आपको मास्क की जरूरत नहीं है।
अगर आप किसी कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, तो आपको मास्क पहनना होगा।
जिन लोगों को बुखार, कफ या सांस में तकलीफ की शिकायत है, उन्हें मास्क पहनना चाहिए और तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए।


कोरोना वायरस का संक्रमण हो जाए तब?

इस समय कोरोना वायरस का कोई इलाज नहीं है लेकिन इसमें बीमारी के लक्षण कम होने वाली दवाइयां दी जा सकती हैं।
जब तक आप ठीक न हो जाएं, तब तक आप दूसरों से अलग रहें।

Tuesday, April 7, 2020

लॉकडाउन क्या होता है-कर्फ्यू क्या होता है


लॉकडाउन

लॉकडाउन क्या होता है?
लॉकडाउन एक इमर्जेंसी व्यवस्था होती है। अगर किसी क्षेत्र में लॉकडाउन हो जाता है तो उस क्षेत्र के लोगों को घरों से निकलने की अनुमति नहीं होती है। जीवन के लिए आवश्यक चीजों के लिए ही बाहर निकलने की अनुमति होती है। अगर किसी को दवा या अनाज की जरूरत है तो बाहर जा सकता है या फिर अस्पताल और बैंक के काम के लिए अनुमति मिल सकती है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के काम से भी बाहर निकलने की अनुमति मिल सकती है।

क्यों किया जाता है लॉकडाउन?
किसी तरह के खतरे से इंसान और किसी इलाके को बचाने के लिए लॉकडाउन किया जाता है। दंगा रोकने के लिए लॉकडाउन किया जाता है। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए लॉकडाउन कई देशों में किया गया है। कोरोनावायरस का संक्रमण एक-दूसरे इंसान में न हो इसके लिए जरूरी है कि लोग घरों से बाहर कम निकले। बाहर निकलने की स्थिति में संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा। इसलिए कुछ देशों में लॉकडाउन जैसी स्थिति हो गई है।



कर्फ्यू क्या होता है?

कर्फ्यू का आदेश डीएम देता है किसी भी जिले के अधिकारी की जिम्‍मेदारी होती है कि वह जिले में सुरक्षा व्‍यवस्‍था को बनाए रखे। भारत में कर्फ्यू एक ऐसा आदेश है जिसके तहत एक निश्चित समय के बाद कुछ प्रतिबंधों को लागू कर दिया जाता है। सरकार की ओर से एक आदेश जारी कर लोगों को एक तय समय पर उनके घर लौटने को कहा जाता है। सा‍माजिक सुरक्षा को बनाए रखने के लिए कर्फ्यू लगाया जाता है।

144 का आदेश डीएम सीआरपीसी की धारा 144 के तहत कुछ प्रतिबंधों को लागू करता है और फिर स्थिति को देखते हुए वह कर्फ्यू का ऐलान भी कर सकता है। डीएम के पास यह अधिकार होते हैं कि वह ऑफिसों और जरूरी सरकारी प्रबंधों का निरीक्षण इस समय कर सकता है।

Monday, April 6, 2020

Short Essay on Guru Tegh Bahadur Ji in Hindi || गुरू तेगबहादुर जी || Gur...





गुरू तेगबहादुर जी

गुरू तेग बहादुर सिखों के नवें गुरु थे। देश, धर्म को बचाने के लिए गुरू तेगबहादुर जी ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

उनके द्वारा रचित ११५ पद्य गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित हैं

जीवन- गुरू तेगबहादुर जी का जन्म सिक्खों के आठवें गुरू श्री हरगोबिन्द जी के घर अमृतसर में 1621 ई० में हआ। गुरू तेग बहादुर जी ने गद्दी पर बैठते ही सिक्खों का संगठन किया। आनन्दपुर नाम का स्थान बसाया। पटना में गुरू तेग बहादुर जी के घर गुरू गोबिन्द सिंह जी का जन्म हुआ। उन्होने कश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध किया। औरंगजेब ने गुरू जी को गिरफ्तार कर लिया। गुरू जी को यातनाएं दी गईं। इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया।
गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।
गुरू जी सच्चे अर्थों में तेजस्वी, महात्मा और देशभक्त थे। धर्म, मानवता, सिद्धांतों के लिए शहीद होने वाले गुरु तेग बहादुर जी का स्थान सिख धर्म में विशेष महत्व रखता है। इन्हें "हिन्द-दी-चादर" के नाम से भी जाना जाता है। अभिमान और छल से रहित थे।

Tuesday, March 31, 2020

गुड फ्राइडे पर निबंध || Short Essay on Good Friday in Hindi || Good Frid...










गुड फ्राइडे पर निबंध

गुड फ्राइडे को होली फ्राइडे और ग्रेट फ्राइडे के नाम से भी जाना जाता है। गुड फ्राइडे को ईस्टर संडे से पहले वाले शुक्रवार को शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन ईसा मसीह को कई शारीरिक यातनाएं देने के बाद सूली पर चढ़ाया गया था। इस कारण इस त्योहार को ब्लैक फ्राइडे भी कहा जाता है। ईसाई धर्म के लोगों की मान्यताओं के अनुसार यीशु (ईसा मसीह) ने लोगों की भलाई के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे। इसलिए इस शोक दिवस को ‘गुड’ का नाम दिया गया है।

ईसाई धर्मानुसार ईसा मसीह परमेश्वर के पुत्र थे। ईसा मसीह को यीशु के नाम से भी पुकारा जाता है। "गुड फ्राइडे"(Good Friday) के दिन ही उन्हें क्रॉस पर लटकाया गया था। इस दिन जीवनभर लोगों में प्रेम और विश्वास जगाने वाले प्रभु यीशु को याद किया जाता है और उनके उपदेशों को सुनाया जाता है। गुड फ्राइडे के दिन श्रद्धालु प्रेम, सत्य और विश्वास की डगर पर चलने का प्रण लेते हैं। कई जगह लोग इस दिन काले कपड़े पहनकर शोक व्यक्त करते हैं।



धर्म ग्रंथों के अनुसार यीशु मसीह का जन्म बैथलहम में हुआ था। बालक यीशु को बैथलहम के राजा हेरोदेस ने मरवाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। बड़े होने पर यीशु मसीह ने जगह-जगह जाकर लोगों को मानवता और शांति का सन्देश दिया। गुड फ्राइडे का त्यौहार वास्तव में प्रभु यीशु द्वारा मानवता के लिए प्राण का न्यौछावर करने का दिन है।

गुड फ्राइडे के दिन ईसाई धर्म के अनुयायी यीशु को उनके त्याग के लिए याद करते हैं।


Monday, March 30, 2020

बैसाखी त्यौहार पर निबंध || Simple & Short Essay on Baisakhi Festival in ...







बैसाखी
त्यौहार पर निबंध
Essay on Baisakhi Festival in Hindi [Punjabi
New Year ]



प्रस्तावना

बैसाखी सिखों का प्रसिद्द त्यौहार है। बैसाखी को ‘वैसाखी’ के नाम से भी जाना जाता है। बैसाखी प्रायः प्रति वर्ष 13 अप्रैल को मनायी जाती है किन्तु कभी-कभी यह 14 अप्रैल को पड़ती है। यह सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है किन्तु पंजाब एवं हरियाणा में इसका विशेष महत्त्व है। यह त्यौहार सिख लोगों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इस दिन को वो अपने नए साल के पहले दिन के रूप में मानते हैं



बैसाखी त्यौहार का महत्व

बैसाखी त्यौहार इसलिए मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन अंतिम सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को खालसा के रूप में संगठित किया और खालसा पन्त की स्थापना हुई थी, । । यह त्यौहार सभी धर्मों एवं जातियों के द्वारा मनाया जाता है। बैसाखी मुख्यतः कृषि पर्व है। यह त्यौहार फसल कटाई के आगमन के रूप में मनाया जाता है।



इस दिन को बहुत शुभ माना जाता है और इसे कई कारणों की वजह से मनाया जाता है। यहां इस दिन के विशेष कारणों पर एक नजर है:
इस दिन को गुरु तेग बहादुर के उत्पीड़न और मौत के बाद सिख आदेश की शुरुआत के रूप में देखा गया जिन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश के अनुसार इस्लाम को कबूलने से इनकार कर दिया। इससे दसवें सिख गुरु के राज्याभिषेक और खालसा पंथ का गठन हुआ। यह दोनों घटनाएँ बैसाखी दिवस पर हुई। यह दिन हर वर्ष खालसा पंथ के गठन की याद में मनाया जाता है।
सिख भी इसे फसल काटने के उत्सव के रूप में मनाते हैं।
यह सिख समुदाय से संबंधित लोगों के लिए भी नए साल का पहला दिन है।
यह एक प्राचीन हिंदू त्योहार है जो सौर नव वर्ष को चिह्नित करता है। हिंदु इस दिन वसंत की फसल का भी जश्न मनाते हैं।



बैसाखी का उत्सव


बैसाखी त्यौहार के दिन सिख लोग अपने अपने पास के गुरुद्वारों में जाते हैं। वहां वो लोग मत्था टेकते हैं और फूल चढ़ाते हैं। इस दिन सिख लोग अपने परिवार जनों के साथ नाचते हैं, स्वादिष्ट खाना खाते हैं । इस दिन वे सभी रंगीन कपडे पहनते हैं और भंगड़ा नृत्य करते हैं जो देखने में बहुत ही अच्छा होता है। पारंपरिक रूप से कई जगह मेला भी लगाये जाते हैं जिसे “बैसाखी मेला” कहा जाता है। वहां बच्चों के लिए सुन्दर खिलौने, स्वादिस्ट मिठाई, और चटपटे खाना भी मिलता है। इन मेलों में सभी लोग अपने परिवार के लोगों के साथ घूमने जाते हैं ।

गुरुद्वारों को इस दिन पूरी तरह से रोशनी और फूलों से सजाया जाता है और इस शुभ दिन को मनाने के लिए कीर्तनों का आयोजन किया जाता है

निष्कर्ष

इस त्यौहार का मूल उद्देश्य है प्रार्थना करना, एकजुट रहना और अच्छे भोजन का आनंद लेना आदि। इस दिन लोगों में बहुत खुशी और उत्तेजना होती है।

Thursday, March 26, 2020

महावीर जयंती पर निबंध || Essay on Mahavir Jayanti in Hindi || Mahavir J...








2020 महावीर जयंती पर निबंध Essay on Mahavir Jayanti in Hindi


महावीर जयंती का उत्सव खासकर भारत में जैन धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाता है। अन्य सभी धर्मों के लोग भी इस दिन को भारत में मनाते हैं। महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे। वो जैन धर्म के प्रवर्तक थे और जैन धर्म के मूल सिधान्तों की स्थापना में उनका अहम योगदान है। उनका जन्म शुक्लपक्ष, चैत्र महीने के 13वें दिन 540 ईसीबी में कुंडलगामा, वैशाली जिला, बिहार में हुआ था। इसलिए प्रतिवर्ष महावीर जयंती के उत्सव को अप्रैल के महीने में बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है।

भगवान महावीर का वास्तविक नाम वर्धमान है इनके पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशाला थी इनके जन्म के समय में यह कहा गया था की या तो ये महान शासक बनेगे या फिर कोई महान तीर्थकर. फिर आयु बढ़ने के साथ महावीर का मन कभी भी सांसारिक कार्यो में नही लगता था और फिर 30 वर्ष की आयु में घर- द्वार राजपाठ का सारा कार्य छोड़कर सत्य की खोज में सांसारिक जीवन को त्याग करके सन्यासी हो गये

फिर भगवान महावीर ने सन्यास की दीक्षा लेने के बाद 12 वर्षो तक कठोर तप किया फिर उन्हें सत्य के ज्ञान की प्राप्ति हुई फिर यही से वर्धमान महावीर कहलाने लगे



इसके बाद भगवान महावीर ने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने अनुयायियो के साथ मिलकर समाज कल्याण के कार्यो में जुट गये और फिर 72 वर्ष की आयु में निर्वाण को प्राप्त हुए



महावीर जयन्ती का पर्व बड़ी धूमधाम और उल्लास से मनाया जाता है । पर्व के कई दिनों पहले से ही पूजा-पाठ की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं । श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों प्रकार के जैन मंदिरों को खूब सजाया जाता है किन्तु सादगी (Simplicity) और पवित्रता (Purity) का ध्यान रखा जाता है । इस पर्व से हमें हर वर्ष यह प्रेरणा (Inspiration) देने का प्रयत्न किया जाता है कि हमें अपने जीवन में झूठ, कपट, लोभ-लालच और दिखावे से दूर रखना चाहिए तथा सच्चा, शुद्ध और परोपकारी जीवन जीना चाहिए त भी अपना और इस संसार का कल्याण संभव है ।


यह दिन जैन धर्म के लिए बहुत ही मायने रखता है। यह दिन राजपत्रित अवकाश के रूप में पूरे भारत में माना जाता है और लगभग सभी सरकारी दफ्तरों तथा शैक्षिक संसथानों में छुट्टी होता है।

Wednesday, March 25, 2020

उगादी त्यौहार पर निबंध


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उगादी त्यौहार पर निबंध Essay on Ugadi Festival in Hindi



उगादी त्यौहार त्यौहार भारत में कर्नाटक, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, और तेलन्गाना में प्रसिद्ध रूप से मनाया जाता है। चैत्र माह के प्रथम अर्ध चन्द्रमा के दिन उगादी के महोत्सव को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन प्रतिवर्ष मार्च से अप्रैल महीने के बीच आता है। उगादी त्यौहार भारत के महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में नव वर्ष की दिन के रूप में माना जाने वाला दिन है|



उगादी पर्व की कहानी

आंध्र प्रदेश में Ugadi का त्यौहार खासकर भगवान ब्रह्मा जी को समर्पित किया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इसी दिन ब्रम्हा जी ब्रह्माण्ड की रचना शुरु की थी।

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार यह भी माना जाता है कि इस दिन भगवान् विष्णु जी ने मतस्य अवतार लिया था। उगादी को लेकर कई सारे ऐतहासिक तथा पौराणिक वर्णन मिलते हैं। ऐसा माना जाता है कि उगादि के दिन ही भगवान श्री राम का राज्याभिषेक भी हुआ था। इसके साथ ही इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर विजय प्राप्त की थी।



उगादी त्योहार कैसे मनाते हैं

इस दिन को लेकर लोगो में काफी उत्साह रहता है और इस दिन वह सुबह उठकर अपने घरों की साफ-सफाई में लग जाते हैं, घरों की साफ-सफाई करने के बाद लोग अपने घरों के प्रवेश द्वार को आम के पत्तों से सजाते हैं।

इसके साथ ही इस दिन एक विशेष पेय बनाने की भी प्रथा है, जिसे पच्चड़ी नाम से जाना जाता है। पच्चड़ी नामक यह पेय नई इमली, आम, नारियल, नीम के फूल, गुड़ जैसे चीजों को मिलाकर मटके में बनायी जाती है। लोगों द्वारा इस पेय को पीने के साथ ही आस-पड़ोस में भी बांटा जाता है। उगादी के दिन कर्नाटक में पच्चड़ी के अलावा एक और चीज का भी लोगों द्वारा खायी जाती है, जिसे बेवु-बेल्ला नाम से जाना जाता है।

यह गुड़ और नीम के मिश्रण से बना होता है, जो हमें हमारे जीवन में इस बात का ज्ञान कराता है कि जीवन में हमें मीठेपन तथा कड़वाहट भरे दोनो तरह के अनुभवों से गुजरना पड़ता है। इस मीठे-कड़वे मिश्रण को खाते वक्त लोगों द्वारा निम्नलिखित संस्कृत श्लोक का उच्चारण किया जाता है।

उगादी त्यौहार पर घरों को रंगोली के रंग से एक अलग ही चमक मिलती है| इस दिन घर के समस्त जण अपने अपने काम से छुट्टी ले एक साथ मौज मस्ती करते हैं| ये त्यौहार हमें वीरता और साहस की एक अलग ही परिभासा सिखाती है|

निष्कर्ष

उगादी का पर्व नए साल की शुरूआत होती है। उगादी के पर्व पर लोगों में बहुत ही ज्यादा खुशी और उत्साह होता है। उगादी के दिन ही नवरात्री का आरंभ होता है। उगादी दिन सभी शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहर्त होता है और इसे राष्ट्रीय गौरव तिथि के रुप में जाना जाता है।

Friday, March 20, 2020

राम मनोहर लोहिया पर निबंध || Essay on Ram Manohar Lohia in Hindi || Dr. ...







राम मनोहर लोहिया एक स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर समाजवादी और सम्मानित राजनीतिज्ञ थे । राम मनोहर ने हमेशा सत्य का अनुकरण किया और आजादी की लड़ाई में अद्भुत काम किया ।

प्रारंभिक जीवन

डॉ० लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तरप्रदेश के अकबरपुर नामक गांव में हुआ था । उनके पिता श्री हीरालाल लोहिया और माता चन्दादेवी थीं ।

1925 में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से इंटर पास किया ।

उसके बाद उन्होंने वर्ष 1929 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और पीएच.डी. करने के लिए बर्लिन विश्वविद्यालय, जर्मनी, चले गए, जहाँ से उन्होंने वर्ष 1932 में इसे पूरा किया। यहां ”इकानॉमिक्स ऑफ साल्ट” विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की ।

उनके कार्य:

भारत वापस आने पर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और वर्ष 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की आधारशिला रखी । वर्ष 1936 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का पहला सचिव नियुक्त किया ।

24 मई, 1939 को लोहिया को उत्तेजक बयान देने और देशवासियों से सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार करने के लिए लिए पहली बार गिरफ्तार किया गया । जून 1940 में उन्हें “सत्याग्रह नाउ” नामक लेख लिखने के आरोप में पुनः गिरफ्तार किया गया और दो वर्षों के लिए कारावास भेज दिया गया । भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में महात्मा गांधी, नेहरू, मौलाना आजाद और वल्लभभाई पटेल जैसे कई शीर्ष नेताओं के साथ उन्हें भी कैद कर लिया गया था । स्वतन्त्रता मिलने के बाद वे 1966 तक संसद में विपक्ष के सदस्य रहे, जहां एक मजबूत विपक्ष की उन्होंने प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया ।

निधन

राम मनोहर लोहिया का निधन 57 साल की उम्र में 12 अक्टूबर, 1967 को नई दिल्ली में हुआ था । 
डॉ० लोहिया देश सेवा में किये गये अपने कार्यों के कारण हमारे बीच लोकनायक की उज्जल छवि के साथ हमेशा जीवित रहेंगे ।

Tuesday, March 17, 2020

डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध || Simple & Short Essay on Dr. B.R. Ambedkar...






डॉ भीमराव अम्बेडकर पर निबंध

डॉ बी. आर. अम्बेडकर एक विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, अर्थशास्त्री, कानूनविद, राजनेता और सामाज सुधारक थे। डा० अंबेडकर ने भारत के संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हें भारतीय संविधान का जनक भी माना जाता है। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री बने। बाबा साहेब डा० भीमराव रामजी अंबेडकर को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से भी सम्मानित किया गया।



प्रारंभिक जीवन

'डा० बी०आर० अंबेडकर' का पूरा नाम डा० भीमराव रामजी अंबेडकर था। डा० अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मऊ, मध्य प्रदेश, भारत में हुआ था वे रामजी मालोजी सकपाल एवं भीमाबाई की संतान थे। डा० अंबेडकर को 'बाबा साहेब' के नाम से भी लोकप्रियता प्राप्त हुई।

शिक्षा


प्रारम्भिक शिक्षा में उन्हें बहुत अधिक अपमानित होना पड़ा । वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे । 1907 में मैट्रिक व 1912 में बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की । बड़ौदा के महाराज की ओर से कुछ मेधावी छात्रों को विदेश में पढ़ने की सुविधा दी जाती थी, सो अम्बेडकर को यह सुविधा मिल गयी ।

अम्बेडकर ने 1913 से 1917 तक अमेरिका और इंग्लैण्ड में रहकर अर्थशास्त्र, राजनीति तथा कानून का गहन अध्ययन किया । पी०एच०डी० की डिग्री भी यहीं से प्राप्त की । बड़ौदा नरेश की छात्रवृत्ति की शर्त के अनुसार उनकी 10 वर्ष सेवा करनी थी ।उन्हें सैनिक सचिव का पद दिया गया । सैनिक सचिव के पद पर होते हुए भी उन्हें काफी अपमानजनक घटनाओं का सामना करना पड़ा ।अपमानित होने पर उन्होंने यह पद त्याग दिया ।

बम्बई आने पर भी छुआछूत की भावना से उन्हें छुटकारा नहीं मिला । यहां रहकर उन्होंने ”वार एट लॉं’ की उपाधि ग्रहण की । 

उनके कार्य

बचपन से लगातार छुआछूत और सामाजिक भेदभाव का घोर अपमान सहते हुए भी उन्होंने वकालत का पेशा अपनाया । छुआछूत के विरुद्ध लोगों को संगठित कर अपना जीवन इसे दूर करने में लगा दिया । सार्वजनिक कुओं से पानी पीने व मन्दिरों में प्रवेश करने हेतु अछूतों को प्रेरित किया । अम्बेडकर हमेशा यह पूछा करते थे- ”क्या दुनिया में ऐसा कोई समाज है जहां मनुष्य के छूने मात्र से उसकी परछाई से भी लोग अपवित्र हो जाते हैं?”

डॉ० अम्बेडकर ने अछूतोद्धार से सम्बन्धित अनेक कानून बनाये । 1947 में जब वे भारतीय संविधान प्रारूप निर्माण समिति के अध्यक्ष चुने गये, तो उन्होंने कानूनों में और सुधार किया ।

उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तकों में 
(1) द अनटचेबल्स हू आर दे?, 
(2) हू वेयर दी शूद्राज, 
(3) बुद्धा एण्ड हीज धम्मा, 
(4) पाकिस्तान एण्ड पार्टिशन ऑफ इण्डिया तथा 
(5) द राइज एण्ड फॉल ऑफ हिन्दू वूमन प्रमुख हैं । 
इसके अलावा उन्होंने 300 से भी अधिक लेख लिखे । भारत का संविधान भी उन्होंने ही लिखा ।

निधन
डा० अंबेडकर का देहांत 6 दिसंबर, 1956 को 65 वर्ष की उम्र में दिल्ली, भारत में हुआ। उनकी याद में प्रति वर्ष उनके जन्मदिन 14 अप्रैल को 'अंबेडकर जयंती' के रूप में सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। 20वीं शताब्दी के श्रेष्ठ चिन्तक, ओजस्वी लेखक, यशस्वी वक्ता, स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री तथा भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माणकर्ता के रूप में डा० भीमराव रामजी अंबेडकर का नाम सदैव याद किया जायेगा।

Monday, March 16, 2020

मोरारजी देसाई पर निबंध || Simple & Short Essay on Morarji Desai || Morar...







मोरारजी देसाई


मोरारजी देसाई (29 फ़रवरी 1896 – 10 अप्रैल 1995) भारत के स्वाधीनता सेनानी और देश के छ्ठे प्रधानमंत्री (सन् 1977 से 79) थे। वह 81 वर्ष की आयु में प्रधानमंत्री बने थे। वही एकमात्र व्यक्ति हैं जिन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न एवं पाकिस्तान के सर्वोच्च सम्मान निशान-ए-पाकिस्तान से सम्मानित किया गया है।

प्रारंभिक जीवन

'मोरारजी देसाई' का जन्म 29 फ़रवरी 1896 को गुजरात के भदेली नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम रणछोड़जी देसाई था जो भावनगर (सौराष्ट्र) में एक स्कूल अध्यापक थे।

शिक्षा

मोरारजी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सौराष्ट्र के ‘द कुंडला स्कूल’ में ग्रहण की । मुंबई के विल्सन कॉलेज से स्त्नातक करने के बाद वो गुजरात सिविल सेवा में शामिल हो गए।

स्वाधीनता आन्दोलन और राजनीतिक जीवन

सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद मोरारजी देसाई स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़े। इसके बाद उन्होंने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध ‘सविनय अवज्ञा’ आन्दोलन में भाग लिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान मोरारजी कई बार जेल गए।

प्रधानमंत्री पद (1977-1979)

मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ इस प्रकार 81 वर्ष की उम्र में मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री बने। मोरारजी देसाई ने पड़ोसी मुल्कों पाकिस्तान और चीन से रिश्ते सुधारने की दिशा में पहल किया। उन्होंने चीन के साथ राजनयिक संबंधो को बहाल किया और इंदिरा गाँधी सरकार द्वारा किये गए बहुत सारे संवैधानिक संशोधनों को उनके मूल रूप में वापस कर दिया।

1979 में राज नारायण और चौधरी चरण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया तब मात्र दो साल की अल्प अवधि में ही मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।

निधन

प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद मोरारजी देसाई ने 83 साल की उम्र में राजनीति से संन्यास ले लिया और मुंबई में रहने लगे। 10 अप्रैल 1995 को 99 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

Friday, March 13, 2020

रामनवमी पर निबंध 2020 || Ram Navami Nibandh in Hindi || Simple & Short E...








रामनवमी पर निबंध 2020 – Ram Navami Nibandh in Hindi – Ram Navami Festival Essay


हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन रामनवमी का त्योहार मनाया जाता है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन को रामजन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। राम जी के जन्म पर्व के कारण ही इस तिथि को रामनवमी कहा जाता है।

राम जन्म कथा

हिन्दु धर्म शास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्री राम के रूप में अवतार लिया था। श्रीराम चन्द्र जी का जन्म चैत्र शुक्ल की नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र तथा कर्क लग्न में रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था।

रामनवमी त्यौहार का महत्व

हिन्दू लोगों के लिए रामनवमी त्यौहार का बहुत ही बड़ा महत्व है। कहा जाता है रामनवमी की पूजा करने वाले व्यक्ति के जीवन से सभी बुरी शक्तियां दूर होती हैं और दैवीय शक्ति मिलती है। रामनवमी का त्यौहार की पूजा सबसे पहले सवेरे सूर्य देव को पानी चढ़ा कर शुरू होता है।

राम नवमी के दिन जगह-जगह घरों और मंदिरों में श्री राम की पूजा-अर्चना की जाती है और झांकियां सजाई जाती हैं। हजारों श्रद्धालुओं के द्वारा अयोध्या (उत्तर प्रदेश), सीतामढ़ी (बिहार), रामेश्वरम (तमिलनाडु), भद्राचलम (आंध्रप्रदेश) आदि स्थलों पर राम नवमी के भव्य समारोह का आयोजन किया जाता है।

कुछ स्थानों (जैसे- अयोध्या, वाराणसी आदि) पर, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की रथ यात्रा अर्थात् जुलूस (शोभा यात्रा) को हजारों श्रद्धालुओं के द्वारा पवित्र नदी गंगा या सरयू में प``वित्र डुबकी लेने के बाद निकाला जाता है।

श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में इस पर्व को बेहद हर्षोल्ललास के साथ मनाया जाता है। रामनवमी के समय अयोध्या में भव्य मेले का आयोजन होता है, जगह-जगह राम लीला का आयोजन किया जाता है |

Thursday, March 12, 2020

विश्व जल दिवस पर निबंध || World Water Day Essay in Hindi || Simple & Sho...





विश्व जल दिवस पर निबंध (World Water Day Essay in Hindi)







जल ही जीवन है। इसके बिना जीवन की कल्पना करना भी असंभव है इसी जल को बचाने के लिए प्रत्येक बर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाता है इसका उद्देशय जल के संरक्षण और रख-रखाव पर जागरुक करना है। संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1993 में एक सामान्य सभा के माध्यम से इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया। इस अभियान में लोगों की जागरुकता बढ़ाने के लिये जल के महत्व की आवश्यकता और जल संरक्षण के बारे में समझाने के लिये हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रुप में मनाया जाने लगा।



विश्व जल दिवस एक अंतरराष्ट्रीय दिवस है। इसका उद्देश्य पानी से संबंधित मुद्दों के बारे में अधिक जानने और इसके लिये सुधार लाने के लिये यह दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करना है।



विश्व जल दिवस भारत, यू एस ए, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, जापान, घाना, बांग्लादेश, जर्मनी, नाइजीरिया, मिस्र और दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों द्वारा मनाया जाता है। विश्व जल दिवस पानी और इसके संरक्षण के महत्व पर केंद्रित है।



पूरे भारत में कई स्कूलों और कॉलेजों में विश्व जल दिवस पर भाषण और निबंध प्रतियोगिताये होती है और इन प्रतियोगिताओं में आमतौर पर पानी और इसके संरक्षण से संबंधित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है।



नीले रंग की जल की बूँद की आकृति विश्व जल दिवस उत्सव का मुख्य चिन्ह है।



धरती पर लगभग केवल 1 प्रतिशत ताजा पानी नदी, तालाब, झरनों और झीलों में है जो पीने लायक है।





जल जनित बीमारियों के कारण प्रतिवर्ष 22 लाख मौतें विश्व में होती हैं। पानी के संसाधन जो उपयोग के लिए उपलब्ध हैं हमें उनका सही तरीके से उपयोग करना चहिये।





World Water Day Themes





2000 में विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “21वीं सदी के लिये पानी की आवश्यकता”।

2001 में विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल, स्वास्थ के लिये”।

2002 में विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल, विकास के लिये”।

2003 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल, भविष्य के लिये”।

2004 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “आपदा और जल”।

2005 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “2005 से 2015 जीवन के लिये पानी”।

2006 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल और संस्कृति”।

2007 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल दुर्लभता के साथ मुंडेर”

2008 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “स्वच्छता और सफाई”।

2009 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल के पार”।

2010 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “स्वस्थ विश्व के लिये स्वच्छ जल”।

2011 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “शहर के लिये जल”।

2012 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल और खाद्य सुरक्षा”।

2013 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल सहयोग”।

2014 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल और ऊर्जा”।

2015 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल और दीर्घकालिक विकास”।

2016 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल और नौकरियाँ”

2017 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “अपशिष्ट जल” होगा।

2018 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “जल के लिए प्रकृति के आधार पर समाधान”

2019 के विश्व जल दिवस उत्सव की थीम थी “कोई भी पीछे छोड़”

Wednesday, March 11, 2020

बिहार दिवस पर निबंध || Short Essay on Bihar Day (22 March) in Hindi || B...






बिहार दिवस पर निबंध: ब्रिटिश हुकूमत ने 22 मार्च, 1912 को बंगाल प्रेसीडेंसी से बिहार को अलग कर दिया था | इसी दिन की याद में बिहार दिवस 22 मार्च को मनाया जाता है | मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा शुरू किया गया ये दिवस पहली बार 2010 में मनाया गया था|
22 मार्च को बिहार में सार्वजनिक अवकाश होता है|
बिहार भारत का एक प्रशासनिक राज्य है। बिहार राजनीति का एक केंद्र बिंदु है | इस देश में से गंगा नदी और उनकी अन्य सहायक नदियों का भी स्थान बिहार देश में बसा है |

महात्मा गांधीजी ने बिहार से ही सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुवात की थी |बिहार का पुरातन काल का नाम ‘मगध’ था | बिहार की राजधानी पटना है | यहाँ की मुख्य भाषा हिंदी, उर्दू, मैथिली, भोजपुरी, मागधी, अंगिका आदि हैं। बिहार के प्रमुख पर्यटन स्थल महात्मा गाँधी सेतु, महाबोधि मंदिर, नालन्दा विश्वविद्यालय, विष्णुपाद मंदिर, बोधगया मंदिर आदि हैं।

बिहार की सीमाएं पूर्व में पश्चिम बंगाल (West Bengal), पशिचम में उत्तर प्रदेश, दक्षिण में झारखण्ड और उत्तर में नेपाल से जुड़ीं है। सन् 2000 में झारखंड राज्य इससे अलग कर दिया गया। बिहार यह एक बहुत बड़ा राज्य है | यह सांस्कृतिक दृष्टी से भी महत्वपूर्ण है |

Thursday, March 5, 2020

Coronavirus क्या है, बीमारी के लक्षण, इलाज और बचाव || कोरोनावायरस की जानकारी: सुरक्षित कैसे रहें

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Coronavirus

क्या है कोरोना वायरस (What is Coronavirus)

कोरोनवायरस, जिसे अब SARS-CoV-2 कहा जाता है, इस रोग का कारण COVID-19 है। कोरोना वायरस (सीओवी) का संबंध वायरस के ऐसे परिवार से है, जिसके संक्रमण से जुकाम से लेकर सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्या हो सकती है| कोरोना वायरस की वजह से रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट यानी श्वसन तंत्र में हल्का इंफेक्शन हो जाता है जैसा कि आमतौर पर कॉमन कोल्ड यानी सर्दी-जुकाम में देखने को मिलता है। इस वायरस को पहले कभी नहीं देखा गया है | इस वायरस का संक्रमण दिसंबर में चीन के वुहान में शुरू हुआ था |

कोरोना वायरस इंफेक्शन के लक्षण क्या हैं (What are the symptoms of coronavirus infection)

हालांकि इस बीमारी के लक्षण बेहद कॉमन हैं और कोई व्यक्ति कोरोना वायरस से पीड़ित न हो तब भी उसमें ऐसे लक्षण दिख सकते हैं। निम्नलिखित लक्षण एक्सपोज़र के 2-14 दिन बाद दिखाई दे सकते हैं। *

बुखार और थकान
खांसी
साँस लेने में कठिनाई
मांसपेशियों में दर्द
नाक बहना
सिर में तेज दर्द
गला खराब
थकान और उल्टी महसूस होना
निमोनिया
ब्रॉन्काइटिस

कोरोनावायरस की जानकारी: सुरक्षित कैसे रहें (Coronavirus information: how to stay safe)
अपने हाथों को धोना सबसे सरल चीजों में से एक है जिसे आप कोरोनोवायरस को पकड़ने से रोक सकते हैं। हाथों को अच्छी तरह से धोएं और हाथों की सफाई का पूरा ध्यान रखें | साबुन या गर्म पानी से लगभग 20 सेकेंड तक हाथ धोएं |

ऐसे लोगों के साथ निकट संपर्क से बचें जो अस्वस्थ हैं |


खांसी और छींक के लिए tissue का उपयोग करें | यदि आपके पास tissue नहीं है तो अपनी आस्तीन का उपयोग करें |


अपने हाथ और उंगलियों से आंख, नाक और मुंह को बार-बार न छूएं |
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कोरोना वायरस को फैलने से कैसे रोकें (How to stop the coronavirus from spreading)

इस जानलेवा कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत है। WHO ने कुछ गाइडलाइंस भी दिए हैं ताकि इस जानलेवा बीमारी को फैलने से रोका जा सके
बीमार मरीजों की सही तरीके से मॉनिटरिंग की जाए
रेस्पिरेटरी यानी सांस से जुड़ी बीमारी के लक्षण किसी में दिखें तो उससे दूर ही रहें
जिन देशों या जगहों पर इस बीमारी का प्रकोप फैला है वहां यात्रा करने से बचें
पब्लिक प्लेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट में कुछ भी छूने या किसी से हाथ मिलाने से बचें

क्या कोरोना वायरस से मौत हो सकती है (Can corona virus cause death)

वैसे तो कोरोना वायरस की शुरुआत सामान्य सर्दी-जुकाम या निमोनिया जैसी होती है लेकिन अगर केस गंभीर हो जाए तो इस इंफेक्शन की वजह से सीवियर अक्यूट रेस्पिरेटरी सिन्ड्रोम, किडनी फेलियर या मल्टीपल ऑर्गन फेलियर तक हो सकता है जिस वजह से मौत हो सकती है।